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Original Stories by Author (88): Identity Card (पहचान पत्र)

This is a collection of Original Creation by Nilesh Mishra

कहानी 88: पहचान पत्र (Identity Card)

"हां नाम बोलो" - बड़े बाबू ने सामने खड़े करीम चाचा से कहा।
"करीम" - अपने जीवन के 76 बसन्त देख चुके करीम चाचा ने हौले से जवाब दिया।
"पता"
"पता नही है"
बड़े बाबू तिलमिला कर सीट से उठ खड़े हुए
"ये मजाक करने की जगह है क्या बे। तुम्हारे पीछे अभी इतने सारे और लोगों को भी निपटाना है मुझे"
"साहब मेरा कोई पता नही है। मैं वही घण्टाघर के आगे वाले पुल के नीचे रहता हूं।" - कांपते होठों से करीम चाचा ने जवाब दिया।
"अबे कही गांव घर जहां परिवार रहता हो उसका पता बता।" - गरीब और असहाय होने की स्वीकारोक्ति के बाद बड़े बाबू की आवाज में Automatically कॉन्फिडेंस आ गया।
"साहब मेरा कोई नही है। बीवी बच्चे दोनों का बहुत पहले इंतकाल हो चुका। वो भी मेरे साथ वहीं रहा करते थे।" - करीम चाचा ने सफाई पेश की।
"अबे यार कोई डॉक्यूमेंट तो होगा, राशन कार्ड आधार वगैरह कुछ तो होगा।" - बड़े बाबू झल्लाए।
"राशन कार्ड के लिए पता चाहिए वो था नही मेरे पास, आधार बनवाने गया तो वहां बताया कि वोटर कार्ड बनवाओ इसीलिए तो बाबू जी यहां आया हूँ। बाबू जी आप ही कुछ रास्ता सुझाइए। लोग कह रहे हैं कि अगर NRC में नाम नही चढ़ा तो मुझे पुलिस पकड़ लेगी।"
"हम्म। कुछ दे सकते हो तो मैं जुगाड़ बताऊँ।" - बड़े बाबू ने चश्मा थोड़ा नीचे किया।
"साहब मैं सब्जी बेचता हूँ, वही है मेरे पास। आप कहे तो ले आऊ। सब ताजी है एकदम।" - करीम चाचा ने ऑफर रखा।
"ठीक है। शाम को दफ्तर बंद होने के बाद मिलना। नेक्स्ट" - बड़े बाबू फिर लाइन खत्म करने में जुट गए।
शाम को 4 बड़े थैले ताजी सब्जियों के विनिमय के बाद बड़े बाबू ने करीम चाचा को "उपाय" बताया की किस तरह से बिना पते के पता बनाया जा सकता था अगर कोई सक्षम आदमी ये लिख के दे दे कि वो उन्हें अच्छी तरह से जानता है। अनाथ, असहाय,  गरीब और ऊपर से एक विशेष समुदाय से जुड़ा नाम - कोई जानकार उन्हें लिखित में जानने को तैयार नही हुआ - क्योंकि न वो किसी को धन देने के काम आ सकते थे और न ही उनके वोट से किसी को कोई वास्ता था। "76 साल का आदमी है, ज्यादा से ज्यादा ये साल या अगला साल ही चलेगा- चुनाव 4 साल बाद हैं। कौन खतरा मोल ले साला स्लीपर सेल का आतंकवादी ही निकल आया तो क्या करूंगा " - ऐसा सोचकर जनप्रतिनिधियों ने भी उसकी मदद को इनकार कर दिया। बात थोड़ी दूर पहुंची तो कुछ उत्साही NGO वालों ने करीम चाचा का पहचान पत्र बनवाने के लिए मुहिम छेड़ी और Legal और Administrative हर चैनल का use किया। Writ Petition कोर्ट में और Applications एक विभाग से दूसरे विभाग में टहलने लगीं। आयोग और कमेटियाँ Form होने लगीं। कुछ जगहों पर मोमबत्तियां भी जलने लगीं। प्राइम टाइम पर करीम चाचा का मुद्दा उठा कर सरकारी फैसलों की आलोचना और प्रशंसा का दौर चला। 5-6 दूसरे देशों ने चाचा को अपने यहां नागरिकता देने और उनके देश का Identity Card देने की पेशकश भी की लेकिन चाचा का कहना था - "मैं तो बस इसी देश की मिट्टी में दफन होना चाहता हूँ।"
2 साल बाद करीम चाचा की ये इच्छा भी पूरी हो गई और उन्हें उसी पुल के नीचे ससम्मान दफना दिया गया।
चाचा को अंत समय मे पहचान तो बहुत मिल गई बस नही मिला उनका पहचान पत्र।
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नीलेश मिश्रा






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