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Original Stories by Nilesh Mishra (104): ईश्वर

 This is a collection of Original Creation by Nilesh Mishra


कहानी 104: ईश्वर

एक बार कई विषयों के विद्वानों को ईश्वर के स्वरूप व उनकी प्रकृति पर चर्चा करने हेतु एक सभा में बुलाया गया। सभी ने अपने अपने ज्ञान के हिसाब से ईश्वर की व्याख्या की।
एक Physicist ने कहा-"ईश्वर जरूर ही एक भौतिकविद होंगे क्योंकि पूरे Observable Universe में आप जहां तक नजर दौड़ाइये हर चीज आपको उन्हीं चुनिंदा नियमों का पालन करती मिल जाएगी जिसे आम भाषा मे हम physics के नियम कहते हैं।"
एक रसायनशास्त्र के विद्वान बोल पड़े-"ईश्वर केमिस्ट्री के उस्ताद हैं। वही कुछ 118 तत्व मिल कर कैसे Ionic, Co-Valent आदि bond बना बना कर असंख्य product बना देते हैं। ये Thermodynamics के नियम बिना Chemistry में interest के कोई उत्पन्न ही नहीं करेगा। अगर ईश्वर outer valence सेल के इलेक्ट्रॉनों को इतना शरारती नहीं बनाते तो न Molecules होते न, प्रोटीन, न Cells और न हम आप यहाँ बहस कर रहे होते।"
एक बॉयोलॉजिस्ट से नहीं रह गया और वो बोल पड़े-"ईश्वर बॉयोलॉजिस्ट हैं वरना available resources use करके survival - ये किसी physicist या chemist के बस की बात नहीं है। उसी DNA strand की वजह से बने दिमाग का उपयोग करके हम उस DNA के रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहे हैं जो 'वो' हर सेकंड खरबों की संख्या में बना बिगाड़ रहे होते हैं वो भी सिर्फ अपने planet पर, बाकी का तो किसी को पता भी नहीं है।"
एक प्रसिद्ध आर्टिस्ट ने कहा -"ईश्वर सबसे बड़े कलाकार हैं। इस विश्व की खूबसूरती को देखिये, महसूस कीजिए, आपको क्या लगता है कि क्या विज्ञान का कोई विद्वान इतने खूबसूरत विश्व का सृजन कर सकता है। अरे मैं बता रहा हूँ आपको, 'उसने' हमें बनाया ही इसलिए है कि हम उस सबसे बड़े कलाकार की कला को देखें और प्रभावित होएं।"
एक बड़े नास्तिक और तर्कशास्त्री ने अपना मंतव्य प्रकट किया-"ईश्वर है ही नहीं, मानव हमेशा से एक छत्रछाया ढूंढता है क्योंकि उसका मस्तिष्क इस तरह से evolve हुआ है कि वह किसी की छत्रछाया में रहने पर अपने को safe feel करता है। साथ ही यह मानव की प्रवृत्ति रही है कि जो भी unexplainable है , वह उसे अपने मन को सुकून देने के लिए किसी पारलौकिक शक्ति से जोड़ना चाहता है, और इसीलिए उसने ईश्वर का आविष्कार किया है। यह सब कुदरत और विज्ञान के नियम हैं जो इस संसार को बनाए हैं और चला रहे हैं।"
धर्मशास्त्र के विद्वान काफी देर से सबकी बातें सुन रहे थे। अपनी बारी आने पर वे मुस्कुराए, और सिर्फ इतना ही कहा -"जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी।"
एक Geologist का भी नम्बर आया पर उन्हें बोलने से मना कर दिया गया। और 6 घंटे चलने के बाद सभा का समापन हो गया।
इधर सभी ब्रह्मांडो और dimensions से परे 'उन्होंने' एक सुपरकंप्यूटर जैसे स्क्रीन पर नजर टिकाए अपने मातहत से पूछा - "हाँ भई बड़े मुस्कुरा रहे हो, किसी ने हमें याद किया क्या?"
मातहत ने कहा-"हां प्रभु! 167वें Universe Cluster के UNIV17896X167 नामक ब्रह्मण्ड के एक सूक्ष्म कोने से किसी ने कहा है - जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी।"
'वे' मुस्कुराए, और मातहत की ओर कुछ इशारा कर आगे चल दिए।
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नीलेश मिश्रा






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